सस्ता इंटरनेट और किफायती स्मार्टफोन बढ़ा रहे स्क्रीन टाइम
भारत में 1.2 अरब से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता और 950 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। 12 रुपये प्रति GB की दर से मिलने वाला सस्ता इंटरनेट और किफायती स्मार्टफोन ने देश को डिजिटल युग की ओर तेजी से बढ़ाया है। लेकिन इसका एक नकारात्मक प्रभाव भी सामने आ रहा है—इंटरनेट की लत, जो खासकर युवा पीढ़ी को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
भारतीय औसतन 5 घंटे मोबाइल पर बिताते हैं
ग्लोबल मैनेजमेंट कंसल्टेंसी EY की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पहले से कहीं अधिक समय अपने स्मार्टफोन पर बिता रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एक औसत भारतीय प्रतिदिन 5 घंटे सोशल मीडिया, गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग में खर्च करता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पहली बार डिजिटल प्लेटफॉर्म ने टीवी को पीछे छोड़ दिया है, जिससे यह भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग का सबसे बड़ा सेक्टर बन गया है।
स्क्रीन टाइम का 70% हिस्सा सोशल मीडिया, गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग में खर्च
रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीयों द्वारा बिताए गए कुल स्क्रीन टाइम में से 70% हिस्सा सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन गेमिंग पर जाता है। EY इंडिया के मुताबिक, यह बदलाव "डिजिटल इन्फ्लेक्शन पॉइंट" को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मीडिया के इस बढ़ते प्रभाव के साथ नए इनोवेशन, बिजनेस मॉडल और साझेदारियों का विस्तार देखने को मिलेगा।
भारत बना दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल मार्केट
इंटरनेट और स्मार्टफोन के इस जबरदस्त उपयोग ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल मार्केट में बदल दिया है। स्क्रीन टाइम के मामले में भारत इंडोनेशिया और ब्राजील के बाद तीसरे स्थान पर है। EY रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में भारतीयों द्वारा मोबाइल स्क्रीन पर बिताया गया कुल समय 1.1 ट्रिलियन घंटे तक पहुंच गया।
बढ़ती इंटरनेट लत: मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा
डिजिटल युग की इस तेजी के साथ एक बड़ा खतरा भी बढ़ रहा है—इंटरनेट और स्मार्टफोन की लत। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे चिंता, तनाव, नींद की कमी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
क्या हो सकता है समाधान?
विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल डिटॉक्स और संयमित स्क्रीन टाइम ही इसका समाधान है। माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों और युवाओं को डिजिटल संतुलन सिखाने की जरूरत है। इसके अलावा, तकनीकी कंपनियों को भी ऐसे फीचर विकसित करने चाहिए, जो स्क्रीन टाइम को सीमित करने में मदद करें।
यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह आने वाली पीढ़ी के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।